हठयोगप्रदीपिका

हठयोग प्रदीपिका हठयोग से सम्बन्धित संस्कृत ग्रन्थ है। इसकी रचना गुरू गोरखनाथ के शिष्य स्वामी स्वात्माराम ने की थी।


हठयोगप्रदीपिका - भाग १

आसन
१. भगवान शिव जी को प्रणाम है, जिन्होंने सबसे पहले हठ योग का ज्ञान इस संसार को दिया । यह ज्ञान एक सीढी के समान है, जो एक साधक को राज योग की ऊँचाई तक पहुँचा देता है ।
२. योगी स्वात्माराम अपने गुरु श्रीनाथ को प्रणाम कर राज योग की प्राप्ति हेतु हठ योग के बारे में बताते हैं ।
३. राज योग के बारे में बहुत से मत भेद होने के कारण जो अज्ञान रूपी अन्धकार फैला हुआ है, जिसके कारण समान्य जान राज योग के सही सही जान नहीं पा रहे हैं । उन पर कृपा कर स्वात्माराम जी हठ योग प्रदीपिका रूपी रौशनी से इस अन्धकार को मिटाते हैं ।
४. मत्स्येन्द्र, गोरक्ष आदि सब हठ योग के ज्ञाता थे, और उन की कृपा से स्वात्माराम जी ने भी उनसे इसे सीखा ।
५. पूर्व काम में ये सिद्ध महात्मा हुये हैं – श्री आदिनाथ जी, मत्स्येन्द्र, नाथ, साबर, अनन्द, भैरव, चौरन्गी, मिन नाथ, गोरक्ष नाथ, विरूपाक्ष, बीलेसय, मन्थन, भैरव, सिद्धि बुद्धै कान्ठादि, करन्तक, सुरानन्द, सिद्धिपाद, चरपति, कानेरि, पिज्यपाद, नात्यनाथ, निरन्जन, कपालि, विन्दुनाथ, काक चन्डीश्वर, अल्लामा, प्रभुदेव, घोदा, चोलि, तितिनि, भानुकि आदि ।
६. ये महासिद्ध महर्षि, मृत्यु को जीत कर अमृत्व को प्राप्त हुये हैं ।
७. जैसे घर मनुष्य की धूप से रक्षा करता है, उसी प्रकार हठ योग एक योगी की तीनों प्रकार के तपों की गरमी से रक्षा करता है । जो सदा योग में लगें हैं, यह हठ योग उन के लिये वैसे ही सहारा देता है जैसे सागर मन्थन में भगवान नें कछुये के रूप से पर्वत को सहारा दिया था ।
८. योगी को हठ योग के ज्ञान को छुपा कर रखना चाहिये, क्योंकि यह गुप्त होने से अधिक सिद्ध होता है और दिखाने से इस की हानि होती है ।
९. योगी को हठ योग एक शान्त कमरे में, जहां पत्थर, अग्नि, जल आदि से कोई हलचल न हो, वहां स्थित हो कर करना चाहिये और ऐसी जगह रहना चाहिये जहां अच्छे लोग रहते हैं, तथा खाने की बहुलता हो, आसानी से प्राप्त हो ।
  १०. कमरे में छोटा दरवाजा हो, कोई सुराख आदि न हों । न वह ज्यादा उँचा हो, न बहुत नीचा, गोबर से अच्छी तरह लिपा हो, और गन्दगी, कीडों आदि से मुक्त हो । उस के बाहर चबूतरा हो और आँगन आदि हो । हठ योग करने के स्थान में ऐसी खूबीयाँ हों तो अच्छा है, यह इस योग में सिद्ध महर्षियों ने कहा है ।
  ११. इस स्थान में बैठ कर, और सभी प्रकार के मानसिक उद्वेगों से मुक्त होकर साधक को योग साधना करनी चाहिये ।
  १२. योग इन छे कारणों से नष्ट हो जाता है – बहुत खाना, बहुत परिश्रम, बहुत बोलना, गलत नियमों का पालन जैसे बहुत सुबह ठंडे पानी से नहाना या देर रात को खाना या केवल फल खाना आदि, मनुष्यों का अत्याधिक संग, औऱ छटा (योग में) अस्थिरता ।
  १३. इन छे से सफलता शिघ्र ही प्राप्त होती है – हिम्मत, नीडरता, लगे रहना, ध्यान देना, विश्वास, और संगती से दूर रहना ।
  १४. इन दस आचरणों का पालन करना चाहिये – अहिंसा (किसी भी प्राणी की हिंसा न करना), सत्य बोलना, चोरी न करना, संयम, क्षमा, सहनशीलता, करुणा, अभिमान हीनता – दैन्य भाव, कम खाना और सफाई ।
  १५. योग के ज्ञाता जन यह दस नियम बताते हैं – तप, धैर्य रखना, भगवान में विश्वास, दान देना, भगवान का ध्यान करना, धर्म संवाद सुनना (पढना), शर्म, बुद्धि का प्रयोग, तपस्य करना और यज्ञ करना ।

आसन
१. आसन हठ योग की सबसे पहली शाखा है, इसलिये सबसे पहले उस का वर्णन करते हैं । इसका अभ्यास स्थिर काया, निरोगता और शरीर का हलकापन पाने के लिये करना चाहिये ।
२. मैं कुछ आसनों का वर्णन करता हूँ जिन्हें वौशिष्ठ जैसे मुनियों और मत्स्येन्द्र जैसे योगियों ने अपनाया है ।

स्वस्तिक-आसन


१. अपने दोनो हाथों को अपने पट्टों के नीचे रख कर, अपने शरीर को सीधा रख, जब मनुष्य शान्ती से बैठता है तो उसे स्वतिक कहते हैं ।

गोमुख-आसन


१. जब अपने दायने ankle को अपने बायें ओर और अपने बायें ankle को अपने दायें ओर रखा जाये, जो गायें के मूँह जैसा दिखता है, उसे गोमुख आसन कहते हैं ।

विरासन

१. एक पैर को दूसरे पट्ट पर रखा जाये और दूसरे पैर को इस पट्ट पर रखा जाये, इसे वीरासन कहते हैं ।

कुर्मासन

१. अपनी दायें ankle को anus के बायें ओर और बायें ankle को anus के दायें ओर रखा जाये, उस आसन को योगी कुर्मासन कहते हैं ।

कुक्कुटसन

१. पदमासन में बैठ कर, फिर हाथों के पट्टों के नीचे रख कर, जब योगी अपने आप को जमीन से उठाता है, हाथों के तलवों को धरती पर टिकाये हुये, तो उसे कुक्कुट आसन कहते हैं ।

उत्तन कुर्मासन

१. कुक्कुट आसन में बैठ कर, अपनी गरदन या सिर को पीछे से पकड कर, अगर जमीन पर पीठ लगा कर लेटा जाये, तो उसे उतान कुर्मासन कहते हैं, क्योंकि यह दिखने में कछुये जैसा लगता है ।

धनुरासन

१. दोनो हाथों से अपने पैरों के अगले भाग (उंगलीयों) को पकड कर, उन्हें (पैरों को) अपने कानो तक ले जाना, जैसे कोई धनुष खींच रहें हों, उसे धनुर आसन कहा जाता है ।

मत्स्यासन

१. अपने पैर को अपने पट्ट (thigh) पर रख कर, अपने हाथ को पीठ की तरफ से ले जा कर उसे पकडना – जैसे दायने पैर को बायें पट्ट पर रख कर, अपने दायने हाथ को पीठ की तरफ से ले जा कर अपने दायने पैर को पकडना, और वैसे ही दूसरे पैर और हाथ से करना – इस आसन को मत्स्य आसन कहते हैं, और इसका वर्णन श्री मत्स्यानाथ जी ने किया था । इस से भूख बढती है, और यह बहुत सी भयानक बिमारियों से रक्षा में सहायक सिद्ध होता है । इस के अभ्यास से कुण्डली जागती है और यह मनुष्य के चन्द्रबिंदू से अमृत छटना रोकता है (इस विष्य में बाद में और बताया गया है) ।

पश्चिमासन

१. पैरों को जमीन पर सीधा कर के (साथ साथ लंबे रख करे), जब दोनो हाथों से पैरों की उँगलीयाँ पकडी जायें और सिर को पट्टों पर रखा जाये, तो उसे पश्चिम तन आसन कहते हैं । इस आसन से शरीर के अन्दर की हवा आगे से शरीर के पीछे के भाग की तरफ जाती है । इस से gastric fire को बढावा मिलता है, मोटापा कम होता है और मनुष्य की सभी बिमारियां ठीक होती हैं । (यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण आसन है)

मयुरासन

१. हाथों के तलवों को जमीन पर रखें और अपनी elbows को साथ साथ लायें । फिर पेट की धुन्नि (navel) को अपनी elbows के ऊपर रखें और इस प्रकार अपने भार को हाथों (elbows) पर टिकाते हुये, शरीर को डंडे के समान सीधा करें । इसे म्यूर आसन कहते हैं ।
२. इस आसन से जल्द ही सभी बिमारियां नष्ट हो जाती हैं, पेट के रोग मिट जाते हैं, और बलगम, bile, हवा आदि के विकारों को दूर करता है, भूख बढाता है और खतरनाख जहर का अन्त करता है ।

सेवासन

१. धरती पर मृत के समान लंबा लेटना, इसे शव आसन कहा जाता है । इस से थकावट दूर होती है और मन को आराम मिलता है ।
२. इस प्रकार भगवान शिवजी नें ८४ मुख्य आसन बताये हैं । लेकिन उन में से पहले चार सबसे जरूरी हैं । यहां मैं उन का वर्णन करता हूँ ।
३. ये चार हैं – सिद्धासन, पद्मासन, सिंहासन और भद्रासन । इन में से भी सिद्धासन बहुत सुखदायी है – इसका सदा अभ्यास करना चाहिये ।

सिद्धासन

१. अपने दायें पैर की एडी को अपने perineum (लिंग के नीचे की हड्डी) के साथ अच्छे से लगायें, और अपने दूसरी ऐडी को अपने लिंग के उपर रखें । अपनी ठोडी (chin) को अपनी छाती से लगायें और शान्ति से बैठें । अपनी इन्द्रियों को संयम कर, अपने माथे के बिच (eyebrows) की तरफ एक टक देखें । इसे सिद्धासन कहा जाता है – जो मुक्ति का द्वार खोलता है ।
२. इसे अपने दायने पैर को अपने लिंग (penis) के उपर और बायें को उसके साथ रख कर भी किया जा सकता है ।
३. कुछ लोग इसे सिद्धासन कहते हैं, कुछ वज्रासन भी कहते हैं । दूसरे कुछ लोग इसे मुक्तासन या गुप्तासन भी कहते हैं ।
४. जैसे कम खाना यमों में पहला यम है, और जैसे अहिंसा (किसी भी प्राणी की हिंसा न करना) पहला नियम है, उसी प्रकार ऋषियों ने सिद्धासन को सभी आसनों में प्रमुख बताया है ।
५. ८४ आसनों में सिद्धासन का सदा अभ्यास करना चाहिये क्योंकि यह ७२००० नाडियों को शुद्ध करता है ।
६. स्वयं पर ध्यान करते हुये, कम खाते हुये, और सिद्धासन का बारह वर्ष तक अभ्यास कर योगी सफलता प्राप्त कर लेता है ।
७. जब सिद्धासन में सफलता प्राप्त हो चुकी हो, और केवल-कुम्भक द्वारा प्राण वायु शान्त और नियमित हो चुकी हो, तो दूसरे किसी आसन की कोई आवश्यकता नहीं है ।
८. केवल सिद्धासन में ही अच्छी तरह स्थिर हो जाने से मनुष्य को उन्मनी प्राप्त हो जाती है और तीनो बंध भी स्वयं ही पूर्ण हो जाते हैं ।
९. सिद्धासन जैसा कोई आसन नहीं है, और ‘केवल’ जैसा कोई कुम्भक नहीं है । केचरी जैसी कोई मुद्रा नहीं है, और नाद (अनहत नाद) जैसी कोई लय नहीं है ।

पद्मासन

१. अपने दायें पैर को अपने बायें पट्ट पर रख कर, और बायें पैर को अपने दायें पट्ट पर रख कर, अपने हाथों को पीछे से ले जाकर पैरों की उंगलीयों को पकड कर बैठना । फिर अपनी ठोडी को छाती से लगाना और अपने नाक के अगले भाग की तरफ देखना । इसे पद्मासन कहा जाता है, यह साधक की बिमारियों का नाशक है ।
२. अपने पैरों को पट्टों पर रख कर, पैरों के तलवे ऊपर की ओर, और हाथों को पट्टों पर रख कर, हाथों के तलवो भी ऊपर की ओर ।
३. नाक के अगले भाग की तरफ देखते हुये, अपनी जीभ को ऊपर के दाँतों की जड पर टीका कर, और ठोडी को छाती के साथ लगाते हुये, धीरे से हवा को ऊपर की ओर खींच कर ।
४. इसे पद्मासन कहा जाता है, यह सभी बिमारियों का नाशक है । यह सब के लिये प्राप्त करना कठिन है, लेकिन समझदार लोग इसे सीख सकते हैं ।
५. दोनो हाथों को अपनी गोदी में साथ साथ रख कर, पद्मासन करते हुये, अपनी ठोडी को छाती से लगा कर, और भगवान पर ध्यान करते, अपनी अपान वायु को ऊपर का तरफ खीचते, और फिर साँस लेने के बाद नीचे को धकेलते – इस प्रकार प्राण और अपान को पेट में मिलाते, योगी परम बुद्धि को प्राप्त करता है शक्ति के जागने के कारण ।
६. जो योगी, इस प्रकार पद्मासन में बैठे, अपनी साँस पर काबू पा लेता है, वह बंधन मुक्त है, इस में कोई शक नहीं है ।

सिंहासन

१. दोनो ऐडीयों को अपने लिंग के नीचे वाली हड्डी से लगा कर ।
२. अपने हाथों को अपने पट्टों पर रख कर, अपने मूँह को खुला रख कर, और अपने मन को संयमित कर, नाक के आगे वाले भाग की तरफ देखते हुये ।
३. यह सिंहासन है, जिसे महान योगी पवित्र मानते हैं । यह आसन तीन बंधों की पूर्ति में सहायक होता है ।

भद्रासन

१. दोनो ऐडीयों को अपने लिंग के नीचे वाली हड्डि से लगा कर (keeping the left heel on the left side and the right one on the right side), पैरों को हाथों से पकड कर एक दूसरे से अच्छे से जोड कर बैठना । इसे भद्रासन कहा जाता है । इस से भी सभी बिमारियों का अन्त होता है ।
२. योग ज्ञाता इसे गोरक्षासन कहते हैं । इस आसन में बैठने से थकावट दूर होती है ।
३. यह आसनों का वर्णन था । नाडियों को मुद्राओं, आसनों, कुम्भक आदि द्वारा शुद्ध करना चाहिये ।
४. नाद पर बारीकी से ध्यान देने से, ब्रह्मचारी, कम खाता और अपनी इन्द्रियों को नियमित करता, योग का पालन करता हुआ सफलता को एक ही साल में प्राप्त कर लेता है – इस में कोई शक नहीं ।
५. सही खाना वह है, जिस में अच्छे से पके, घी और शक्कर वाले खाने से, भगवान शिव को अर्पित करने के पश्चात खाकर ¾ भूख ही मिटाई जाये ।

खाद्यसंबंधी जानकारी

१. कडवी, खट्टी, नमकीन, सडी, तेल से भरी, दारू युक्त, मछली, मास, दहियां, पयाज, लसन आदि नहीं खाना चाहिये ।
२. फिर से गरम किया खाना, सूखा, बहुत ज्यादा नमकीन, खट्टा, या ऐसी सबजियाँ जो जलन करती हैं नहीं खानी चाहिये । अग्नि, औरतें, सफर आदि से टलना चाहिये ।
३. जैसा की गोरक्ष नें कहा है, योगी को बुरे लोगों के संग से, आग, औरतें, सफर, बहुत सुबह नहाना, निरन्न रहना और अत्याधिक शारीरिक परिश्रम से टलना चाहिये ।
४. कनक, चावल, मक्कि, दूध, घी, शक्कर, मक्खन, शहद, अदरक, परवल, पाँच सबजियाँ, मूँग दाल, शुद्ध पानी – यह सब योगाभ्यास करने वाले के लिये बहुत लाभ दायक हैं ।
५. योगी को ताकत देने वाले पदार्थ खाने चाहिये, अच्छे से मीठे किये, घी डाले, दूध, मक्खन आदि जिन से शरीर की शक्ति बढे ।
६. चाहे कोई जवान हो, बूढा या बहुत बूढा हो, बिमार या पतला हो, जो कोई भी आलस त्याग कर योग का अभ्यास करता है उसे सफलता मिलती है ।
७. जो अभ्यास में लगा है, उसे सफलता प्राप्त होती है । भला अभ्यास किया बिना की सफलता कैसे प्राप्त हो सकती है, क्योंकि केवल योग की किताबें पढने से कभी सफलता नहीं मिल सकती ।
८. योग में सफलता कोई वेश धारण करके नहीं मिल सकती । न ही कहानियाँ बता कर इसे प्राप्त किया जा सकता है । केवल अभ्यास ही इसमें सफलता का साधन है । यह सच है, इसमें कोई शक नहीं है ।
९. आसन, कुम्भक और अन्य दैविक साधन, यह सभी का हठ योग में अभ्यास करना चाहिये जब तक राज योग का फल न प्राप्त हो जाये । यहीं पहले अध्याय का अन्त होता है जो मुख्य प्रकार से आसनों के ऊपर है ।